एकादशाह श्राद्ध दान सम्पूर्ण विधि। वाजसनेयी
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धर्मशास्त्रों में दान की अत्यधिक महत्व बताई गयी है जो मुक्ति के लिये सबसे उत्तम और सुलभ रास्ता हैं । दान करने से सांसारिक माया-मोह भंग होता है । दान करने के बाद भी मोह भंग न हो तो मुक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती है। इसलिए समय अनुसार मनुष्य को प्राकृतिक के अनुसार चलना आवश्यक होता हैं।
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Ekadasha Shradhya Sampurn Vidhi |
कब दान करे ? – जैसे श्राद्ध,जन्म,उत्सव,पर्व,ग्रहण,व्रत–उद्यापन आदि। तथापि उचित पात्र जब कभी उपलब्ध हो, विद्वान ब्राह्मण को उचित पात्र कहा गया है, उस समय बिना किसी मुहूर्त के भी दान करना चाहिये।
श्राद्ध में दान : प्रेत श्राद्ध में दो प्रकार की दान विधि होती है – प्रथम महापात्र को जो श्राद्ध स्थला पर और द्वितीय गृह-प्राङ्गण में पुरोहित को दान करना। दोनों में किञ्चित अंतर होता है।
महापात्र को नाम-गोत्र का उच्चारण करके हस्तदान दिया जाता है। लेकिन पुरोहित को अनाम-गोत्र से कुशा पर दान दिया जाता है।
महापात्र दान और दक्षिणा लेकर प्रतिग्रह स्वीकारोक्ति “ॐ स्वस्ति” प्रतिवचन प्रदान करते हैं, पुरोहित के लिये त्रिकुश पर दान दिया जाता है अतः “ॐ स्वस्ति” रूपी स्वीकारोक्ति का प्रतिवचन नहीं होता।
तथापि उदहारण हेतु एक अन्य दान – “तण्डुल पाकपात्र दान” विधि यहाँ बताई गई हैं।
तण्डुल पाकपात्र दान
तण्डुल पाकपात्र दान विधि (उदहारण हेतु) :
- पूर्वाभिमुख तण्डुल पाकपात्र (चावल सहित) पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ सतण्डुल पैत्तल तण्डुल पाकपात्राय नमः नमः ॥३॥
- ब्राह्मण के दाहिने पैर की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- सतण्डुल तण्डुल पाकपात्र को कुशोदक से अभिसिक्त करे । त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।। पुनः ब्राह्मण के दाहिने पैर सत्
य़ह सिर्फ श्राद्ध स्थल पर महापात्र के लिए हैं। प्रांगण में कुश पर किया जाता हैं। |
- ब्राह्मण को तिल-जल दे : ॐ इदं सतण्डुल पैत्तल तण्डुल पाकपात्रं ददानि ॥
- ब्राह्मण दाहिने हाथ से ग्रहण करके “ॐ स्वस्ति” कहे।
यहाँ पर विशेष धयान देनेवाली एक ख़ास बात अगर पुरुष वर्ग का श्राद्ध कर्म हैं तो गोत्रस्य पितुः पिता का नाम प्रेतस्यअगर महिला वर्ग का श्राद्ध हैं तो ,गोत्रायाः मातुः माता का नाम प्रेतायाः पढ़ना हैं | इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया तो प्रेतात्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी और कर्म का फल प्राप्त नहीं होता हैं | इस दोष को पितृ दोष भी कहा जाता हैं |
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल ब्राह्मण को दे :
- ॐ अद्य अमुक गोत्रस्य पितुः नाम प्रेतस्य (महिला हो तो) गोत्रायाः मातुः नाम प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम इदं सतण्डुल पैत्तल तण्डुल पाकपात्रं विष्णु दैवतम् ……… गोत्राय ……… शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ स्वस्ति’ कहें।
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे :
- ॐ अद्य कृतैतत् सतण्डुल पैत्तल तण्डुल पाकपात्र दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं अमुक गोत्राय ब्राह्मण का नाम ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ कहकर दक्षिणा ले ले और सतण्डुल पैत्तल तण्डुल पाकपात्रं स्पर्श करे।
एकादशाह के दिन महापात्र को दिये जाने वाले दान की यही विधि होगी। वस्तु देवता के लिये आगे दिये
को देखें।
प्राङ्गण दान विधि
प्राङ्गण को गोबर से लीपकर पवित्र कर लें। पूर्वदिशा में शय्या लगाकर बिछावन आदि बिछा दे एवं मसहरी लगा दे। अन्य शय्या के सभी लगा दें। एक लोटे व गिलास में जल भरकर सिरहाने में रखकर अन्य पात्र से ढंक दें।
उसके आगे केला का पत्ता या अन्य उपलब्ध पवित्र पत्ता बिछाकर उसपर उजला वस्त्र बिछायें, फिर उसपर चावल, चूड़ा आदि अन्न, फल, विष्णु प्रतिमा, पूजोपकरण आदि अलग-अलग रखें। सभी पात्रों में पात्र से सम्बंधित वस्तु भी दें जैसे :-बड़े टोकने और थाली में चावल
- छोटे टोकने में दाल और डब्बु, कटोरी में दाल
- कटाही में छोलनी और सब्जी
- गमला में पूरी-मिठाई
- बाल्टी-कलशी-लोटा-ग्लास-जग में जल
- चौकला पर आटा और बेलना
- सस्पेन में चायपत्ती-चीनी-छन्ना-कप
- डाला में चूड़ा-चीनी, बगल में दही से भरा हांड़ी या कोहा
- टेबल पर अखबार,
- धूप चश्मा, रेडियो,
- मोबाइल, लेपटॉप आदि, विद्धुत चालक यंत्र हैं|
- बगल में कुर्सी और छड़ी
- इसके साथ ही बाल्टी में रस्सी बांधें,
- विष्णु प्रतिमा को वस्त्र,
- पुस्तक को वस्त्र में लपेट कर रखें।
स्नानादि करके यजमान पूर्वाभिमुख बैठकर पवित्रीकरण, चंदन धारण करके धूप-दीप जला ले, एक पत्ते पर ब्राह्मण (दर्भबटु) निमित्तक उत्तराग्र त्रिकुशा रखे, एक अन्य पत्ते पर दूसरा पूर्वाग्र त्रिकुशा रखे। पूर्वाग्र त्रिकुशा कल्पित वस्तुओं या बाद में देने वाले वस्तुओं के निमित्त होता है जैसे – भूमि, वृक्ष आदि।
पवित्रीकरण : ॐ अपवित्रः पवित्रोऽ वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याऽभ्यन्तरः शुचिः पुण्डरीकाक्षः पुनातु । ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥ सभी वस्तुओं पर जल छिड़क कर शरीर पर भी छिड़क ले, तीन बार आचमन कर ले।
--Daan Samgri--
- गौ दान विधि
- शय्या दान विधि
- काञ्चनपुरुषदान विधि
- छत्रदान :
- उपानद्दान :
- अनुपदी दान (यदि चप्पल हो तो अनुपदी कहे)
- मुद्रिका दान
- पूजोपकरण दान :
- धार्मिक पुस्तक दान :
- मञ्जूषा दान :
- गैस चूल्हा दान :
- बड़ा पीतल टोकना (चावल सहित) दान :
- छोटा पीतल टोकना (दाल और सहित ) दान :
- पीतल कटाही (सब्जी और छोलनी सहित) दान :
- चौकला-बेलन दान :
- गमला (पूरी-मिठाई सहित) दान :
- परात/थार (चावल सहित) दान :
- हंसिया (सब्जी सहित) दान :
- सस्पेन-कप-छन्ना (चायपत्ती-चीनी सहित) दान :
- चूड़ा-दही-चीनी (डाला सहित) दान :
- बाल्टी रस्सी बंधा हुआ (जल सहित) दान :
- जग (जल सहित) दान :
- कांस्य थाली (चावल सहित) दान :
- कांस्य कटोरी चम्मच सहित (दाल सहित) दान :
- कांस्य लोटा (जल सहित) दान :
- कांस्य गिलास (जल सहित) दान :
- लाइट (जलाकर, चार्जर सहित) दान :
- मोबाइल (चार्जर सहित) दान :
- टेलीविजन (उपकरण सहित) दान :
- फ्रिज (बोतल में जल, फल, मिष्टान्न आदि सहित) दान :
- पंखा दान :
- मोटरसाइकिल दान :
- लौह-लवण-कार्पास दान :
- कुर्सी-टेबल (छड़ी-समाचारपत्र-चश्मा आदि) दान :
- सप्तधान्य दान :
- वर्षभोज दान :
गौ दान विधि
गो को पूर्वाभिमुख रखे, वस्त्रादि से आच्छादित कर दे, बछड़ा को निकट में रखे, नीचे बाल्टी (दोहन पात्र) रख दे। गाय के पीछे पूर्वाभिमुख होकर गाय के पीठ की पूजा करे व दान करने के बाद गोपुच्छ (तिल-जल सहित) ब्राह्मण के हाथ में दे।
बैसे इतनी वास्तु का धर्म शास्त्र में चर्चा है । परन्तु जो सामग्री उपलब्ध उतना ही मंत्र बोले “हेमशृंगीं रौप्यखुरां ताम्रपृष्ठां वस्त्रयुगच्छनां कांस्योपदोहां मुक्तांगुलभूषितां” कहा गया है। जिस अवस्था में गाय हो । जैसे हेमशृंगि न हो तो हेमश्रृंगी न कहे।
- तीन बार गाय की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- गाय को कुशोदक से अभिसिक्त करे । त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।। पुनः ब्राह्मण के दाहिने पैर सत्
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे :
- ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम इमां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां हेमशृंगीं रौप्यखुरां ताम्रपृष्ठां वस्त्रयुगच्छनां कांस्योपदोहां मुक्तांगुलभूषितां रुद्रदैवतां यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय अहं ददे ॥ (यदि एकादशाह को गोदान करे तभी “अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि” कहे द्वादशाह को करे तो न कहे।)
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
ब्राह्मण गाय का पुच्छ ग्रहण कर पढ़े :
वाजसनेयी –
ॐ कोऽदात् कस्माऽअदात् कामोऽदात् कामायाऽदात् । कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामः समुद्रमाविशत् । कामेन त्वा प्रतिगृह्णामि कामैतत्ते ॥
• छन्दोगी –
ॐ क इदं कस्मा ऽअदात् कामः कामायाऽदात् । कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामः समुद्रमाविशत् । कामेन त्वा प्रतिगृह्णामि कामैतत्ते ॥
गोमूल्य दान विधि :
यदि गोदान न कर सके तो गोमूल्य दान करे। गोमूल्य दान विधि इस प्रकार है।
- तीन बार गोमूल्य की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ एतावत् द्रव्यमूल्यक सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे –
- ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम एतावत् द्रव्यमूल्योपकल्पितां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां रुद्रदैवतां यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय अहं ददे ॥
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् द्रव्यमूल्योपकल्पित सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
शय्या दान विधि
- शय्या पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छींटे : ॐ सोपकरणशय्यायै नमः ॥३॥
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- शय्या को कुशोदक से सिक्त करे ।
- त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।। पुनः ब्राह्मण त्रिकुशा पर सत्
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल त्रिकुशा पर दे ।
- ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम इमां सोपकरणां शय्यां विष्णु दैवताम् यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत्सोपकरण शय्यादान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
काञ्चनपुरुषदान विधि
- भगवान विष्णु की स्वर्ण प्रतिमा पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ फलवस्त्रसमन्वित काञ्चनपुरुषाय नमः ॥३॥
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- भगवान विष्णु की स्वर्ण प्रतिमा को सिक्त करे ।
- त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।। पुनः ब्राह्मण केदाहिने पैर सत्
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे –
- ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः अमुकप्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम इदं फलवस्त्र समन्वितकाञ्चनपुरुषं विष्णु दैवतम् यथानाम गोत्राय अमुकशर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं सम्प्रददे ॥
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् फलवस्त्रसमन्वित काञ्चनपुरुष दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
छत्रदान
- छाता पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ छत्राय नमः ॥३॥• उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- छाते को कुशोदक से सिक्त करे ।
- त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।। पुनः ब्राह्मण के दाहिने पैर सत्
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे –
- ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) आवरण काम इदं छत्रं उत्तानाङ्गिरो दैवतम् यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् छत्र दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
उपानद्दान :
- सव्य पूर्वाभिमुख होकर उपानद् पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ उपानद्भ्यां नमः ॥३॥
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।। पुनः ब्राह्मण के दाहिने पैर सत्
- ।पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे –
- ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) तप्त-बालुकासि-कण्टकित-भूदुर्ग-सन्तरण काम इमे उपानहौ उत्तानाङ्गिरो दैवते यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् उपानद्दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
अनुपदी दान ( यदि चप्पल हो तो )
- सव्य पूर्वाभिमुख होकर उपानद् पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ अनुपदीभ्यां नमः ॥३॥
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- उपानद् को कुशोदक से सिक्त करे । त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।। पुनः ब्राह्मण के दाहिने पैर सत्
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे –
- ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) तप्त-बालुकासि-कण्टकित-भूदुर्ग-सन्तरण काम इमे अनूपद्ये उत्तानाङ्गिरो दैवते यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् अनुपदी प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
मुद्रिका दान
- मुद्रिका पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ मुद्रिकायै नमः ॥३॥
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- मुद्रिका को कुशोदक से सिक्त करे । त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।। पुनः ब्राह्मण के दाहिने पैर सत्
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे –
- ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम इमां मुद्रिकां विष्णु दैवताम् यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् मुद्रिका दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
पूजोपकरण दान :
- पूजा के उपकरणों पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ सोपकरण पूजोपकरणेभ्योभ्यो नमः ॥३॥
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- पूजा के उपकरणों को कुशोदक से सिक्त करे ।
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे –
- ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम एतानि सोपकरणानि पूजोपकरणानि विश्वकर्म दैवतानि यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् सोपकरण पूजोपकरण दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
धार्मिक पुस्तक दान :
- वस्त्रावेष्टित कई धार्मिक पुस्तकों पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के-ॐ सावरण धार्मिक पुस्तकेभ्यो नमः ॥ [ तीन बार ]
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे-ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥[ तीन बार ]
- वस्त्रावेष्टित धार्मिक पुस्तकों को कुशोदक से सिक्त करे ।
- त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।।
पुनः ब्राह्मण के दाहिने पैर सत् - पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे – ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम एतानि सावरणानि धर्मपुस्तकानि सरस्वती दैवतानि यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् सावरण धार्मिक पुस्तक दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे।
मञ्जूषा दान :
- मञ्जूषा पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ सावरण सोपकरण मञ्जूषायै नमः ॥[ तीन बार ]
- उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे-ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥[ तीन बार ]
- मञ्जूषा को कुशोदक से सिक्त करे । त्रिकुशा जल से भिगोकर उल्टे हाथ दान की गई वस्तु छिड़के मंत्र बोले तत् ।। पुनः ब्राह्मण के दाहिने पैर सत्
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल; उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर दे – ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम इमां सोपकरणां मञ्जूषां वनस्पति दैवतां यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् सोपकरण मञ्जूषा दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ उत्तराग्र त्रिकुशा (दर्भबटु) पर द